मुख्यमंत्री के जीरो टॉलरेंस को ठेंगा दिखा प्रशासन की नाक के नीचे हो गया खेला,तीन बीघा सरकारी भूमि माफिया के शिकंजे में!
हरिद्वार।शनिवार को भूमि फ्रॉड की जांच हेतु बनो गढ़वाल मंडल की एसआईटी ने भले ही चार दर्जन से अधिक मामलों में मुकदमा दर्ज किए जाने के आदेश जारी किए हों लेकिन हरिद्वार में जिला प्रशासन की नाक के नीचे विष्णुलोक कॉलोनी की करोड़ों रुपये की कीमत वाली लगभग तीन बीघा सरकारी भूमि पर कब्जा कर ठिकाने लगाने का गंभीर मामला सामने आया है। यह भूमि मूल रूप से भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड द्वारा अधिग्रहित की गई थी, जो कि अहमदपुर कड़च्छ क्षेत्र में खसरा संख्या 1291 के अंतर्गत आती है। इस भूमि को बाद में औद्योगिक विकास के उद्देश्य तथा अवैध अतिक्रमण करने वालों के पुनर्वास हेतु संबंधित विभागों को हस्तांतरित किया गया था, जिसमें हरिद्वार रुड़की विकास प्राधिकरण भी शामिल है। इस पूरे मामले में अब अचानक खसरा संख्या 1291 का स्वामी बनकर एक व्यक्ति के सामने आ खड़ा होने से सवाल उठ खड़े हुए हैं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली और भूमि अभिलेखों की पारदर्शिता भी सवालों के घेरे में आ गई हैं।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, खसरा संख्या 1291 की यह भूमि पहले ही शासनादेश के माध्यम से औद्योगिक विकास विभाग और विकास प्राधिकरण को सौंप दी गई थी। इसका उद्देश्य क्षेत्र में औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देना और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा करना था। लेकिन अप्रैल 2026 में एक व्यक्ति अचानक सामने आता है और इस भूमि पर अपना निजी स्वामित्व होने का दावा ठोक देता है। यहीं से शुरू होता है करोड़ों रुपये की इस जमीन पर कब्जे का खेल।
बताया जा रहा है कि उक्त व्यक्ति ने कुछ कथित दस्तावेजों के आधार पर खुद को भूमि का मालिक बताते हुए राजस्व अभिलेखों में बदलाव कराने की कोशिश की। इस प्रक्रिया में संबंधित क्षेत्र के पटवारी की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि बिना उच्च अधिकारियों की जानकारी के इस तरह के परिवर्तन संभव नहीं हैं, जिससे यह मामला और भी गंभीर हो जाता है।
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब भूमि पहले से ही सरकारी उपयोग के लिए अधिग्रहित और हस्तांतरित की जा चुकी थी, तो फिर किसी निजी व्यक्ति द्वारा उस पर दावा कैसे किया जा सकता है। क्या राजस्व अभिलेखों में छेड़छाड़ की गई है या फिर अधिकारियों की मिलीभगत से यह पूरा खेल रचा गया है? इन सवालों का जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है, लेकिन जांच की मांग तेज हो गई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई पहला मामला नहीं है, जब सरकारी भूमि पर इस तरह से कब्जा करने की कोशिश की गई हो। इससे पहले भी हरिद्वार और आसपास के क्षेत्रों में भूमि घोटालों के कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठे हैं। इस बार मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसमें एक बड़ी औद्योगिक इकाई द्वारा अधिग्रहित भूमि शामिल है।
सूत्रों के अनुसार, संबंधित पटवारी और रजिस्ट्रार कानूनगो पर आरोप है कि दोनों ने जानबूझकर अभिलेखों में मनगढ़ंत रिपोर्ट लगाते हुए भूमाफिया का साथ दिया या फिर लापरवाही बरती, जिससे यह स्थिति उत्पन्न हुई। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक विफलता का उदाहरण होगा, बल्कि भ्रष्टाचार की ओर भी संकेत करता है। वहीं, कुछ अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
इस प्रकरण ने प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि समय रहते इस पर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह अन्य भूमाफियाओं के लिए भी एक उदाहरण बन सकता है। ऐसे में जरूरी है कि जिला प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए पारदर्शी जांच कराए और सच्चाई सामने लाए।
भूमि जैसे संवेदनशील विषय में किसी भी प्रकार की लापरवाही या भ्रष्टाचार न केवल सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि आम जनता के विश्वास को भी कमजोर करता है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस मामले में निष्पक्ष जांच हो और दोषियों को दंडित किया जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
फिलहाल, यह मामला हरिद्वार में चर्चा का विषय बना हुआ है और सभी की नजरें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।



