सवाल? : भू माफिया का कब्जा तो हटा लेकिन गलत रिपोर्ट देने वाले पटवारी के खिलाफ कार्रवाई कब

हरिद्वार। विष्णु लोक कॉलोनी में करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी भूमि पर हुए अवैध कब्जे का मामला अब केवल भू माफियाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इस पूरे प्रकरण में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली भी गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। दस्तक न्यूज़ में खबर प्रकाशित होने के बाद हरिद्वार जिला प्रशासन भले ही कुंभकरणी नींद से जागा और आनन-फानन में कार्रवाई करते हुए कब्जा हटवा दिया गया, लेकिन इस पूरे खेल में अहम भूमिका निभाने वाले हल्का लेखपाल के खिलाफ अब तक कोई ठोस कार्रवाई न होना प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर रहा है।

दरअसल, मामला उस बेशकीमती सरकारी भूमि का है जिसे भू माफियाओं द्वारा सुनियोजित तरीके से कब्जाने का प्रयास किया गया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सरकारी अभिलेखों में दर्ज भूमि को आबादी की भूमि दर्शाने का प्रयास किया गया। सूत्रों की मानें तो इस पूरी प्रक्रिया में राजस्व विभाग के जिम्मेदार कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा खेल संभव ही नहीं था। जिस प्रकार वास्तविक अभिलेखों और पुराने रिकॉर्ड को नजरअंदाज करते हुए रिपोर्ट तैयार की गई, उससे साफ प्रतीत होता है कि हल्का लेखपाल ने अपने पद और अधिकारों का दुरुपयोग किया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते दस्तक न्यूज़ इस मामले को प्रमुखता से उजागर न करता तो संभवतः करोड़ों रुपये की सरकारी भूमि हमेशा के लिए भू माफियाओं के कब्जे में चली जाती। खबर प्रकाशित होने के बाद प्रशासन हरकत में आया और उप जिलाधिकारी के नेतृत्व में टीम गठित कर भूमि से अवैध कब्जा हटवाया गया। प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान मौके पर भारी पुलिस बल भी तैनात किया गया ताकि किसी प्रकार का विरोध या व्यवधान उत्पन्न न हो सके।
हालांकि कब्जा हटने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर वह कौन लोग थे जिन्होंने भू माफियाओं को संरक्षण दिया। राजस्व विभाग की रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की कार्रवाई होती है और यदि रिपोर्ट ही गलत तैयार कर दी जाए तो सरकारी संपत्तियों को बचाना लगभग असंभव हो जाता है। ऐसे में हल्का लेखपाल की भूमिका बेहद संदिग्ध मानी जा रही है। सूत्रों के अनुसार संबंधित लेखपाल ने मौके की वास्तविक स्थिति और सरकारी रिकॉर्ड को दरकिनार कर ऐसी रिपोर्ट तैयार की जिससे भू माफियाओं को लाभ पहुंच सके।
गौरतलब है कि उत्तराखंड में लगातार सरकारी भूमि पर कब्जों के मामले सामने आ रहे हैं और अधिकांश मामलों में राजस्व विभाग के कुछ कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं। बावजूद इसके विभागीय स्तर पर कार्रवाई केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है। यही कारण है कि भू माफियाओं के हौसले लगातार बुलंद होते जा रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जिन अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई जाए उनके खिलाफ सख्त विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जाए। लोगों का कहना है कि केवल कब्जा हटाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन लोगों को भी बेनकाब करना जरूरी है जिन्होंने सरकारी तंत्र के भीतर रहकर भू माफियाओं का साथ दिया।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन केवल कार्रवाई का दिखावा कर मामले को ठंडे बस्ते में डालता है या फिर वास्तव में दोषियों के खिलाफ कठोर कदम उठाकर यह संदेश देता है कि सरकारी भूमि पर कब्जा कराने वालों और उन्हें संरक्षण देने वालों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।



